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Sagar Watch news

Sagar Watch News/ देश का प्रथम 101 करोड़ रू. की लागत का संत रविदास मंदिर पूर्ण मूर्तरूप ले रहा हैजिसका भूमि पूजन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया था और इसके पूर्ण होने अवधि अगस्त 2025 तक है। मंदिर के निर्माण की केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा सतत् मॉनिटरिंग की जा रही है।

संत रविदास मंदिर 66 फुट ऊंचा होगा। इस मंदिर में अध्योध्या धाम के भगवान श्री राम लला मंदिर में लगे राजस्थान के धोलपुर वंशीपहाड़पुर के लाल पत्थरों का उपयोग हो रहा है। मंदिर के गर्भगृह में केवल पत्थर, रेत, गिटटी का उपयोग करते हुए मंदिर को भव्य एवं दिव्य रूप दिया जा रहा है।

कलेक्टर संदीप जी आर ने बताया कि विगत वर्ष संत रविदास जंयती के अवसर पर मध्यप्रदेश शासन के द्वारा 101 करोड रू. की लागत से संत रविदास मंदिर, संग्राहालय की घोषणा की गई थी। 

कलेक्टर के मुताबिक संत रविदास मंदिर एवं संग्राहालय में जो प्रमुख रूप से विशेषताएं रहेगी, उनमें बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी का समय भारत में भक्ति आंदोलन का समय था। मध्यकाल में कई संतों ने सामाजिक समानता और जाति आधारित भेदभाव उन्मूलन पर बल दिया। इनमें रविदासजी महान सुधारक और सत्य के उपदेशक बनकर प्रमुख संत के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

अपनी रचनाओं के माध्यम से रविदासजी ने ईश्वर के एक रूप का स्वीकार किया, जाति भेद की आलोचना की और समानता का समर्थन किया। ’संत शिरोमणि’ उपाधि प्राप्त गुरु संत रविदास को लोग ’रैदास’ के नाम से भी जानते हैं। 

संवत 1377, काशी में माघ पूर्णिमा के दिन जन्मे संत रैदास की रचनाएँ आध्यात्मिक एवं सामाजिक रूप से काफी प्रगतिशील रही। रैदासजी ने अपने आचरण तथा व्यवहार से प्रमाणित किया कि मनुष्य जन्म से नहीं अपने कर्मों से महान बनता है।

संत रविदास मन्दिर और संग्रहालय

मध्यप्रदेश सरकार, संत रैदास के सामाजिक परिष्कार एवं एकता के विचार और लोक- परिमार्जन एवं मानवता की वाणी को रक्षित करने का प्रयास करने जा रही है। मध्यप्रदेश सरकार ने संत रविदास के सराहनीय कार्यों को महान श्रद्धांजलि देने का विचार किया है। 

साथ ही, संत रविदास की वाणी-विरासत को सुरक्षित रखकर नई पीढ़ी तक पहुंचाने हेतु मध्यप्रदेश सरकार द्वारा ’संत रविदास मन्दिर और संग्रहालय’ का निर्माण करने जा रही है। सागर जिले में मन्दिर एवं संग्रहालय का निर्माण श्रद्धेय कवि व समाज सुधारक संत रविदासजी के सत्कार्यों को अंजली देना एवं उनके जीवन-मूल्य व विरासत को उजागर करना है। समानता एवं ईश्वर के प्रति समर्पण भाव इस मन्दिर और संग्रहालय का केन्द्र बिंदु बनेगा।

संत रविदास मंदिर एवं संग्रहालय का भवन - संत रविदास मन्दिर एवं संग्रहालय’ परिसर विभिन्न सुविधाओं के साथ देश-विदेश के कई साधक, संशोधक एवं भक्तों को आकर्षित करेगा। अव्याआधुनिक संसाधन, रोशनी, पेड़-पौधों से परिसर का वातावरण ज्ञान के साथ सुकून का अनुभव करायेगा। साथ ही, इस परिसर की डिज़ाइन वास्तुकला के आधार से तैयार की जायेगी।
संत रविदास मन्दिर एवं संग्रहालय’ 12 एकड भूमि में आकार लेगा। जिसका प्रारूप इस प्रकार है,

 मन्दिर - इस परियोजना के मध्यस्थ 5500 वर्ग फिट में मुख्य मन्दिर आकार लेगा। मन्दिर नागर शैली से बनाया जा रहा है। मन्दिर में गर्भगृह, अन्तराल मन्डप तथा अर्धमन्डप का सुंदर निर्माण होगा। 

मन्दिर केवल पूजा का स्थान न बनकर सांस्कृतिक-आध्यात्मिक चर्चाओं का केन्द्र स्थान बनेगा। आगंतुक भारतीय संस्कार व संस्कृति के विषय में विस्तार से जान पायेंगे। आध्यात्मिक विश्वासों पर चिंतन एवं मनन के लिए यह केन्द्र मुख्य आकर्षण बनेगा।

जलकुंड - ’संत रविदास संग्रहालय’ (म्यूज़ियम) के प्रवेश द्वार के सामने बड़ा सा जलकुंड आकार लेने वाला है। सुन्दर नक्काशी और मूर्तियों के साथ इस जलकुंड के आसपास पेड़ पौधों की रमणियता प्रदान की जायेगी। जल से पवित्रता का अनुभव होता है, इसलिए कुंड के पास विहार करने योग्य विशाल स्थान बन रहा है।

संग्रहालय - मन्दिर के आसपास वर्तुलाकार की भूमि पर चार गैलेरी बनेगी जिसमें, संत रविदासजी के जीवन को विस्तृत रूप से एवम् आधुनिक संसाधनों की सहायता से प्रस्तुत किया जायेगा। संत रविदास की वाणी, उनके कार्य, सामाजिक प्रदान, भक्ति आंदोलन, आंदोलन में संत रविदास की भूमिका आदि विषयों को कलात्मक रूप से आधुनिक तकनिकों के साथ दर्शाया जायेगा।

पुस्तकालय - दस हजार वर्गफुट में पुस्तकालय और संगत सभाखंड आकार ले रहा है। यहाँ संत रविदास की उपलब्धियाँ और शिक्षाओं को संग्रहीत किया जायेगा। संत रविदासजी के कृतित्व के साथ यहाँ आध्यात्मिक, धार्मिक पुस्तकें भी रखी जायेगी। 

यह पुस्तकालय एक तरह साहित्य संसाधनों का भंडार बनकर सामने आयेगा। यहाँ संत रविदास के साथ अन्य महान गुरुओं एवं दार्शिनकों के विचार व वाणी को संभाला जायेगा। आगंतुक इस स्थान पर बैठकर पुस्तक पढ़ सके ऐसी व्यवस्था उपलब्ध होगी।

संगत सभाखंड - संगत सभाखंड का आकार फूलों की पंखुडियों जैसा बनेगा। नवीन रूप से निर्माण होनेवाले इस विशाल सभाखंड में संत रविदासजी की वाणी के साथ कई अन्य धार्मिक, आध्यात्मिक, संशोधनलक्षी कार्य होंगे, जैसे व्याख्यान, कार्यशाला, संगोष्ठियाँ। इस स्थान पर आकर लोग अपने विचारों का सरलतम तरीके से आदान- प्रदान कर पायेंगे। संगत सभाखंड सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण एवं संवर्धन स्त्रोत बनेगा

भक्त निवास - भक्त निवास, 12,500 वर्गफुट में निर्मित हो रहा है। यह क्षेत्र विश्वभर से पधारें साधक, भक्त, संशोधक, विद्वान, यात्रियों के निवास की व्यवस्था करेगा। आरामदायक एवं आवश्यक रहने की व्यवस्थाएँ यहाँ उपलब्ध होगी। एयर कंडीशनिंग कमरें, साफ बिस्तर, संलग्न बाथरूम वाले पंद्रह कमरे होंगे। साथ ही, पचास व्यक्तियों के लिए छात्रावास सुविधाएँ भी प्राप्त होगी।

अल्पाहार गृह - मुलाकातियों के लिए पंद्रह हजार वर्गफुट में विशाल अल्पाहार गृह का निर्माण होगा। तम्बू-आकार की डिज़ाइन वाले यह अल्पाहार गृह में नाश्ते-भोजन के साथ अन्य सामग्री परोसी जायेगी। बैठने के लिए पारंपरिक मेज एवं कुर्सियों के साथ बाहरी बैठक व्यवस्था भी बनाई जायेगी। 

गजेबों - आल्पाहार-गृह के पास दो बैठने योग्य स्थान बनेंगे। मुलाकाती इस स्थान का उपयोग बैठने, पढ़ने, नास्ता करने, विचारों का आदान-प्रदान करने हेतु कर पायेंगे। 1940 वर्गफुट में निर्मित यह क्षेत्र खुला होने के कारण आसपास का प्राकृतिक दृश्य का आनंद लेना सरलतम एवं सुकूनदेह होगा।

संत रविदास मन्दिर एवं संग्रहालय’ के माध्यम से आधुनिक विकास एवं कलात्मकता के साथ संत रविदासजी की शिक्षाएँ व दिक्षाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचेगी। यह आध्यात्मिक स्थान समग्र विश्व के विभिन्न संस्कृति के साधकों का स्वागत करेगा और साथ ही रहस्यवाद पथ की गहरी समझ व्यापक बनायेगा।

संत रविदास जी के भव्य मंदिर एवं कला संग्रहालय आदि के निर्माण 11 एकड़ भूमि में किया जावेगा। इस सम्पूर्ण योजना की लागत राशि रु 101 करोड़ प्रस्तावित है। योजना के अंतर्गत विभिन्न घटकों का समायोजन किया गया है, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है- मंदिर - संत रविदास जी का नागर शैली से पत्थरों का एक भव्य मंदिर का निर्माण लगभग 10000 वर्गफिट क्षेत्रफल में किया जा रहा है। 

इंटरप्रिटेशन म्यूजियम संस्कृति एवं रचनात्मक विशेषता के साथ साथ संत जी के दर्शन को प्रदर्शित करने वाली एक विशेष शैली के इंटरप्रिटेशन म्यूजियम का निर्माण किया जाएगा म्यूजियम का कुल क्षेत्र फल 14000 वर्गफुट में हो रहा है, जिसके अंतर्गत म्यूजियम में चार गैलरियाँ निर्मित की जा रही है।
 
प्रथम गैलरी- संत रविदास जी के महान जीवन का प्रदर्शन।
द्वितीय गैलरी- संत रविदास जी के भक्ति मार्ग तथा निर्गुण पंथ में योगदान।
तृतीय गैलरी- संत रविदास के दर्शन का विभिन्न मतों पर प्रभाव तथा रविदासिया पंथ।
चतुर्थ गैलरी- संत रविदास की काव्योंचित, साहित्य एवं समकालीन विवरण।

संत रविदास जी के जीवन वृतांत का चित्रण समस्त परिसर में म्युरल स्कल्प्चर के माध्यम से किया जावेगा, मंदिर परिसर में दो भव्य प्रवेश द्वार एवं भव्य पार्किंग, सी.सी.टी.वी., फायर फाइटिंग, लाइटिंग इत्यादि की समुचित व्यवस्थाएँ निर्मित की जावेगी।

मनीष डेहरिया सहायक अभियंता पर्यटन  ने बताया कि मंदिर निर्माण का कार्य शीघ्रता से चल रहा है, जिसमें अभी तक निर्माण एंजेसी यूनिट इंजीवेन्चर कसोटियम एलएलपी नोयडा के द्वारा 25 प्रतिशत किया जा चुका है। 

उन्होंने बताया कि मंदिर का फाउंडेशन कार्य पूर्ण तथा म्यूजियम फाउंडेशन का कार्य प्रगति पर है। डोरमेट्री के दो तल, भक्त निवास के दो तल, वाउड्रीबाल, कुण्ड कालोनेड स्ट्रक्चर फाउंडेशन का कार्य प्रगति पर है। टायलेट ब्लॉक स्ट्रक्चर, लाईब्रेरी टिपंथ एवं कैफेटेरिया का कार्य पूर्ण हो रहा है।

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सागर में 12 फरवरी को संत शिरोमणि सद्गुरु रविदास जी महाराज की 648वीं जयंती धूमधाम से मनाई जाएगी। अहिरवार महापंचायत के अध्यक्ष अनिल अहिरवार ने बताया कि यह जयंती ऐतिहासिक होगी, जिसके लिए दो दिवसीय कार्यक्रम निर्धारित किए गए हैं।

11 फरवरी: सुबह 10 बजे से भगवानगंज चौराहे से विशाल वाहन रैली निकाली जाएगी, जो शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए वापस भगवानगंज में समाप्त होगी।

12 फरवरी: शहर के विभिन्न वार्डों से झांकियां निकाली जाएंगी, जो भगवानगंज में एकत्र होकर शोभायात्रा के रूप में आगे बढ़ेंगी और पुनः वहीं समापन होगा। इसके बाद सम्मान समारोह आयोजित किया जाएगा, जिसमें समाज के गणमान्य व्यक्तियों को सम्मानित किया जाएगा। शाम 6 बजे विशाल भंडारे का आयोजन भी होगा।

इस जयंती में अहिरवार समाज के साथ-साथ अन्य समुदायों के लोग भी शामिल होंगे, जिससे सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलेगा।

युवा जिला अध्यक्ष नरेंद्र सिंह सूर्यवंशी ने बताया कि संत रविदास जयंती को लेकर युवाओं में जबरदस्त उत्साह है। नगर अध्यक्ष मुकेश रोहित ने कहा कि इस बार सागर नगर में ऐतिहासिक जयंती मनाई जाएगी। सभी वार्डों में वाहन रैली और शोभायात्रा की तैयारियां की जा रही हैं, जिसमें अहिरवार समाज के विभिन्न संगठन एक मंच पर आकर भाग लेंगे।

पाध्यक्ष धर्मेंद्र चौधरी ने बताया कि महापंचायत ने वार्डों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक समाज के सभी लोगों को इस आयोजन में शामिल होने का आग्रह किया है। डॉ. कमलेश अहिरवार ने कहा कि महापंचायत ने समाज को एकजुट करने के लिए व्यापक प्रयास किए हैं।

जिला सचिव काशीराम ठेकेदार ने समाज के प्रमुख सदस्यों को आमंत्रित किया, जबकि कोषाध्यक्ष दीपचंद ठेकेदार ने सामाजिक एकता को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई। अजाक्स के पूर्व जिला अध्यक्ष गंगाराम चौधरी ने बताया कि अनुसूचित जाति वर्ग के सभी अधिकारी और कर्मचारी इस जयंती में सहभागी बनेंगे

अर्पित ठेकेदार ने सभी व्यवस्थाओं को निर्धारित समय में अपनी टीम के साथ पूरा करने का संकल्प लिया है। धन सिंह अहिरवार एडवोकेट ने बताया कि हमने समाज के सभी वर्गों को एक मंच पर लाने का बीड़ा उठाया है और सभी से अधिक से अधिक संख्या में इस आयोजन में पहुंचने की अपील की है। 

जिला प्रवक्ता रामू ठेकेदार और मुन्ना लाल ठेकेदारने बताया की इस बार जयंती के कार्यक्रम में सभी जनप्रतिनिधि एक साथ मिलकर जयंती मनाएंगे और सभी युवाओं से वाहन रैली में अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होने की अपील की है एवं शोभा यात्रा में सभी वरिष्ठ जन युवा वर्ग महिलाएं एवं बच्चे सम्मिलित होकर कार्यक्रम को सफल बनाएं।

श्रीमद्भागवत कथा का समापन

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बालाजी मंदिर के गिरिराज स्वरूप गिरी पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का समापन बुधवार को हुआ। कथा व्यास पं. इंद्रेश जी महाराज ने सात दिवसीय कथा का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि सागर शहर का सौंदर्य और मंदिरों की भव्यता उन्हें वृंदावन जैसा अनुभव कराती है। 

उन्होंने भक्ति के विभिन्न स्वरूपों पर चर्चा करते हुए बताया कि भगवान को मित्र बनाना ही भागवत प्राप्ति का संकेत है। साख्य भक्ति के महत्व को समझाते हुए उन्होंने कहा कि जितेंद्रिय, विरक्त इंद्रिय और प्रशांत आत्मा के गुणों से ठाकुर जी को सखा बनाया जा सकता है।

उन्होंने तीन प्रकार के दुखों – काल, कर्म और स्वभावजन्य दुखों की व्याख्या करते हुए कहा कि परिस्थिति के कारण कई लोग अपराध कर बैठते हैं, लेकिन हमें उनके प्रति हीन भावना नहीं रखनी चाहिए। कथा में भगवान श्रीकृष्ण के 16,108 विवाह, अश्वमेघ यज्ञ, सुदामा चरित्र और यदुवंश के अंत की कथा का वर्णन किया गया।

माता-पिता की सेवा से श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण

पूज्य महाराज जी ने समाज में वृद्धाश्रमों के बढ़ते चलन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब भारत में एक भी वृद्धाश्रम नहीं रहेगा, तभी इसे श्रेष्ठ राष्ट्र कहा जाएगा। माता-पिता की सेवा भगवान को प्रसन्न करती है, इसलिए उनके प्रति प्रेम और सम्मान बनाए रखना चाहिए।

उन्होंने कैदियों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई और कहा कि परिस्थिति के कारण ही व्यक्ति गलत कार्य करता है, इसलिए हमें उन्हें हेय दृष्टि से देखने के बजाय उनके सुधार में सहयोग देना चाहिए।

राजनीति और आध्यात्म का संगम

समापन अवसर पर कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की उपस्थिति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राजनीति और अध्यात्म का अद्भुत संगम उनमें देखा जा सकता है। इस अवसर पर माध्व गौड़ेश्वर वैष्णवाचार्य श्री पुंडरीक गोस्वामी जी सहित कई संतजन भी उपस्थित रहे।

पूज्य संतों ने कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैसे पहले कुंभ स्नान के लिए जाने वाले व्यक्ति पूरे गांव की भेंट ले जाते थे, वैसे ही वे सागरवासियों के प्रेम को कुंभ स्नान में समर्पित करेंगे। कथा व्यास ने सागरवासियों को पुनः दर्शन देने का आश्वासन देते हुए सभी को प्रणाम किया।

आयोजन समिति के मीडिया प्रभारी श्रीकांत जैन के मुताबिक  सप्त दिवसीय की कथा प्रांरभ एवं विश्राम के पूर्व मुख्य यजमान अनुश्री शैलेन्द्र कुमार जैन विधायक सागर ने सपरिवार एवं केबिनेट मंत्री कैलाष विजयवर्गीय, नगर निगम अध्यक्ष वृन्दावन अहिरवार, जिलाध्यक्ष श्याम तिवारी, पूर्व जिलाध्यक्ष , नगर नगर आयुक्त सहित बड़ी  संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित रहे।  समापन पर  श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की 

 
 

        

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जीवन में चार प्रमुख पुरुषार्थ बताए गए हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। पहले तीन पुरुषार्थों का अनुसरण करते हुए व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मोक्ष की ओर बढ़ता है। धर्म का पालन, धनार्जन और इच्छाओं की पूर्ति करते-करते मनुष्य थक जाता है और निवृत्ति की भावना प्रबल होने लगती है, जिससे मोक्ष की कामना जन्म लेती है। किंतु मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग स्पष्ट नहीं होता।

परम पूज्य कथा व्यास पं.इन्द्रेष उपाध्याय जी के अनुसार, मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रेम आवश्यक है। यह प्रेम सांसारिक नहीं बल्कि ईश्वर के प्रति होना चाहिए, क्योंकि सांसारिक प्रेम स्वार्थ पर आधारित होता है और धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है। वहीं, ठाकुर जी से जुड़ा प्रेम प्रतिदिन बढ़ता है। श्रीमद्भागवत कथा इसी प्रेमभाव को जागृत करने का साधन है।

इन्द्रेष महाराज ने कथा के तृतीय दिवस में बताया कि आत्मा का उत्थान ही परम धर्म है, जो प्रेम और विश्वास से उत्पन्न होता है। बिना पूर्ण विश्वास के कोई भी कार्य सफल नहीं हो सकता, और भागवत कथा यह विश्वास प्रदान करती है। कथा के माध्यम से भक्तों को भक्ति, प्रेम और सेवा का महत्व समझाया गया।

उन्होंने वृंदावन की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि सागर नगर की गलियों में भी वृंदावन का अनुभव होता है, अतः इसे 'लघु वृंदावन' या 'गुप्त वृंदावन' कहना अधिक उचित होगा। साथ ही, उन्होंने ठाकुर जी की सेवा, गोसेवा, और भक्ति की महत्ता को सुंदर भजनों के माध्यम से प्रस्तुत किया।

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श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन बालाजी मंदिर परिसर में कथा व्यास इंद्रेश जी महाराज ने धर्म और परमधर्म का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि धर्म जीवन यापन के लिए आवश्यक कर्म है, जिसमें भोजन, पर्यावरण संरक्षण, भाषा की शुद्धता और सामाजिक समरसता शामिल हैं। लेकिन परमधर्म वह है जिसमें भक्ति और कथा श्रवण के माध्यम से भगवान के परमधाम को प्राप्त किया जाता है।

उन्होंने बताया कि ईर्ष्या भगवत प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। संसार मिथ्या है, लेकिन परमात्मा की लीला सत्य है। उन्होंने काशी के भागवत पाठी ब्राह्मण और काले खान की भावुक कथा सुनाई। दक्षिणा में सभी भक्तों से गोपीगीत का पाठ नित्य करने का आग्रह किया।

उन्होंने वृंदावन और सागर की तुलना करते हुए कहा कि जिस प्रकार गिरिराज पर्वत भक्तों की माला धारण करते हैं, वैसे ही कथा स्थल भी पुण्यात्माओं का संगम है। अंत में उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत ही साक्षात श्रीकृष्ण हैं और उनका प्रत्येक शब्द दिव्य स्वरूप धारण करता है।




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  श्री सिद्ध क्षेत्र बालाजी श्री हनुमान मंदिर प्रागंण अंबेडकर वार्ड में राष्ट्रीय संत परम पूज्यनीय इन्द्रेश महाराज के मुखारविंद से श्रीमद्भागवत कथा प्रारंभ हुई। 

इन्द्रेश महाराज ने कहा कि अगले सात दिनों तक यह पावन भूमि श्रीधाम वृंदावन बन गई है। उन्होंने भक्तों से बुंदेलखंडी और व्रज भाषा सीखने का आह्वान किया।

श्री राधे जय जय गोपाल जय जय भजन के साथ कथा का शुभारंभ हुआ, जिससे पूरा पंडाल भक्तिभाव से गूंज उठा। महाराज जी ने कहा कि सागर में भी कुंभ जैसा माहौल बन गया है। उन्होंने भागवत कथा के महत्व को बताते हुए कहा कि जहां यह कथा होती है, वहां तीर्थ और कुंभ का वातावरण स्वतः निर्मित हो जाता है।

उन्होंने बताया कि भगवान के तीन स्वरूप होते हैं—सत्य, चैतन्य और आनंद। कथा में सत्य स्वरूप प्रकट होता है, वैष्णव भक्तों के दर्शन से चैतन्य स्वरूप, और भक्ति व प्रेम से आनंद स्वरूप की अनुभूति होती है।

उन्होंने ज्ञान और वैराग्य को भक्ति के दो पुत्र बताते हुए कहा कि ज्ञान केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि सत्य का निर्णय करने की शक्ति है। वैराग्य का अर्थ किसी वस्तु का त्याग नहीं, बल्कि इच्छाओं के त्याग से है।

गोस्वामी हित मोहित मराल जी ने कहा कि इन्द्रेश महाराज प्रेम और भक्ति की वर्षा करने सागर पधारे हैं, और सागरवासियों को इस आध्यात्मिक वर्षा में स्वयं को भिगोकर प्रभु प्रेम प्राप्त करना चाहिए।

कथा के शुभारम्भ से पहले मुख्य कथा व्यास पूज्य इंद्रेश उपाध्याय जी महाराज भोपाल मार्ग से सागर पहुंचे। सागर पहुंचने पर विधायक निवास स्थित संत निवास पर कथा के मुख्य यजमान अनुश्री-शैलेंद्र कुमार जैन ने गरिमामय रूप से अगवानी की  



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प्रयागराज में महाकुंभ के अवसर पर श्री गौरी शंकर मंदिर में आयोजित श्री रामचरित मानस सम्मेलन के तृतीय दिवस पर पंडित मदन मोहन मिश्र ने राम कथा के जनकल्याणकारी उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि राम द्वारा धनुष तोड़ने का प्रसंग जीवन में नम्रता का महत्व दर्शाता है—जो झुकता है, वह बचता है, और जो घमंड करता है, वह नष्ट हो जाता है।

सेवा की भावना पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सेवा का धर्म होता है, और सेवा देने व लेने वाले दोनों को इसका पालन करना चाहिए। जरूरत से अधिक सेवा लेने से श्रद्धा में कमी आ सकती है।

परिवार की सेवा को ही सच्ची पूजा बताते हुए उन्होंने कहा कि यदि परिवार प्रसन्न है, तो यही सबसे बड़ा धर्म है। भगवत स्मरण से पहले घर-परिवार की सेवा जरूरी है।

उन्होंने आंतरिक सुंदरता को अधिक महत्वपूर्ण बताया, क्योंकि मन की सुंदरता ही व्यक्ति को सम्मान दिलाती है।

बेटियों के महत्व पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि बेटियां दो कुलों को रोशन करती हैं और त्याग व प्रेम का प्रतीक होती हैं।

समारोह में भगवान राम के धनुष तोड़ने, परशुराम संवाद और राम-सीता विवाह के प्रसंगों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।

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श्रीमद् भागवत कथा व्यास पंडित इंद्रेश उपाध्याय का आज 30 जनवरी दिन गुरूवार को सागर आगमन होगा। सात दिवसीय  श्रीमद् भागवत कथा आगामी 5 फरवरी तक चलेगी।इस सिलसिले में कथा स्थल बालाजी मंदिर प्रांगण पर सभी तैयारियां पूर्ण हो चुकी है। 

मीडिया प्रवक्ता  श्रीकांत जैन के मुताबिक मुख्य यजमान अनुश्री शैलेन्द्र कुमार जैन ने सभी सागर जिला वासियों को श्रीमद् भागवत कथा के लिए आमंत्रित किया है। दोपहर 2.30 बजे से श्रीमद् भागवत कथा प्रारम्भ होगी। 

बुधवार 29 जनवरी की दोपहर रेल मार्ग से विहार करते हुये गुजरात से भगवान पूज्य श्री ठाकुरजी गिरधारी लालजी का सागर आगमन हुआ। मुख्य यजमान विधायक शैलेन्द्र कुमार जैन ने रेल्वे स्टेशन  पहुँचकर विधि विधान से पूज्यनीय प्रभु की आगवानी की।

कथा वाचक पंडित इंद्रेश उपाध्याय  महाराज के साथ पूज्यनीय गोस्वामी श्रीहित मोहित मराल जी (तिलकायत अधिकारी, ठा.श्री राधावल्लभ सम्प्रदाय, वृंदावन धाम), युवराज श्रीहित षोभित गोस्वामी जी (ठाकुर श्री राधावल्लभ जी, वृंदावनधाम) कथा के पहले दिन मौजूद रहेंगे।

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आईजी बंगला से सिविल लाईन रोड पर श्री हनुमान दुर्गा भैराव धाम में संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा में कथा व्यास आचार्य अरविंद भूषण ने कथा के तीसरे दिन ध्रुव  चरित्र एवं जड़भरत की कथा सुनायी। 

वैवश्वत मनु शत्रुपा के यहां दो पुत्र उत्तनपाद और प्रियवृत्त एवं तीन पुत्रियां देवहुति, आकृति, प्रसूती हुई है। राजा उत्तानपाद के यहां दो रानियां है। एक का नाम सुनीति और दूसरी स्वरूची है, रानी सुनीति के यहां पुत्र  ध्रुव  ने जन्म लिया।  ध्रुव  जब अपने पिता की गोद में बैठे थे उसी समय उनकी दूसरी मां ने उन्हें गोद से उठाकर कहा इस गोद में बैठने के अधिकारी तभी होगे जब  कौख से जन्म लोगें। 

बालक धु्रव की उस सयम पांच वर्ष की अवस्था थी। बालक धु्रव ने अपनी मां सुनीति को यह सभी वृतान्त सुनाया। मां ने कहा बेटा तुम्हारी दूसरी मां ने ठीक ही कहा है। तुम परमपिता परमात्मा की गोद में बैठने हेतु उनकी तपस्या करों। बालक ध्रुव  मां के आदेश से वन में तपस्या के लिये निकल पड़ते है। 

रास्ते में सद्गुरु नारद जी द्वारा परीक्षा ली गई कि यह बालक घोर जंगल में कैसे तस्पया करेंगा और उन्होंने गुरु मंत्र दिया। धु्रव ने कठोर तपस्या करके पहले जल, वायु और बाद में स्वांस तक रोकने जैसी कठोर तपस्या करके बचपन में ही भजन के प्रभाव से भगवान को पाया। कथा में आगे बताया गया कि हमें अच्छे कर्म करना चाहिये। 

जैसा कर्म करोगे वैसा ही फल प्राप्त होता है। व्यक्ति के बुरे कर्म उसके पंतन का करण बनते है। किसी के पास कुछ भी प्राप्त हो जाये धन संपत्ति, पद किन्तु उसे घमंड, अभिमान नही होना चाहिये। शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जायेगा एवं भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया जायेगा। 


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आईजी बंगला से सिविल लाईन रोड पर श्री हनुमान दुर्गा भैराव धाम में संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस कथा व्यास आचार्य अरविंद भूषण ने कथा के दूसरे दिन श्रीमद् भागवत की रचना करने की प्ररेणा दिये जाने संबंधी कथा सुनायी 

श्रीमद् भागवत कथा भगवान श्री कृष्ण का वांग्यमय रूप है। जिसमें भागवत भक्तों की कथा विस्तार से समझाई गई है। इस ग्रंथ में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म एवं उनकी लीलाओं का विस्तार से विवरण किया गया है। आगे कथा में बताया गया कि हमें भगवान राम, कृष्ण को हमेशा ह्दय में धारण करना चाहिये। सांसारिक जीवन में हम रहे किन्तु संसार हम में न रहे। 

सांसारिकता एवं माया के प्रभाव व्यक्ति भगवान के भजन से दूर होता जा रहा है। हमें कथा श्रवण कर उसे ह्दय में धारण करना चाहिये एवं जीवन में कथा के द्वारा बताये गये धर्म मार्ग पर चलना चाहिये। माता पिता की सेवा करना चाहिये। माता पिता के चले जाने के बाद हम उनके निमित्त अनेक धार्मिक आयोजन श्राद्ध आदि करते है। किन्तु उनके जीवित रहते हुये उनकी सेवा से दूर रहते है। 

गुरुवार को धुव चरित्र एवं जड़भरत की कथा श्रवण कराई जाएगी। 

श्रीमद भागवत कथा-प्रथम दिवस 

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रामकथा हमें सिखाती है जीवन कैसे जीना है लेकिन जीवन में मोक्ष कैसे प्राप्त हो वह भागवत कथा ही सिखाती है यह कथा भक्तों की कथा है। यह कथा व्यक्ति को जीते जी एवं मरने के बाद भी मोक्ष प्रदान करती है। यह कथा भगवान श्रीकृष्ण का वांग्यमय रूप है। यह महत्व की कथा पदमपुराण से ली गई है, जो छह अध्याय में वर्णित है।

 यह उदगार आईजी बंगला से सिविल लाईन रोड में श्री हनुमान दुर्गा भैराव धाम में संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के प्रथम दिवस कथा व्यास आचार्य अरविंद भूषण महाराज द्वारा श्रीमद् भागवत कथा के महत्व का वर्णन करने के दौरान व्यक्त किये। 

आचार्य श्री द्वारा कथा में बताया गया कि किसी भी पुराण के महत्व को जाने बिना श्रोता एवं भक्त में ग्रंथ के प्रति श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती। श्रोताओं में श्रद्धा भक्ति उत्पन्न हो इसलिये ग्रंथ के वाचन के पहले उसके महत्व को समझाना शास्त्र सम्मत है। 

यह कथा भगवान श्रीकृष्ण का वांग्यमय रूप है। यह महत्व की कथा पदमपुराण से ली गई है, जो छह अध्याय में वर्णित है। कथा में बताया गया कि सूत जी द्वारा सोनकादि ऋषियों को महत्व की कथा समझाई गई। 

आत्मदेव को संतान न होने के कारण गहरा दुःख था। एक संत से मिलने पर उन्होंने संतान की चिंता छोड़ने का उपदेश दिया। संत ने कहा कि वंश बढ़ाने से अधिक महत्वपूर्ण है सत्कर्म। लेकिन आत्मदेव संतान की मांग पर अड़े रहे। संत ने उन्हें प्रसाद दिया, जिसे उनकी पत्नी ने गाय को खिला दिया। गाय से जन्मे पुत्र को गौकरण नाम दिया गया, जो विद्वान बने। वहीं, आत्मदेव की पत्नी ने अपनी बहन को प्रसाद खिलाकर एक और पुत्र धुधकारी को जन्म दिया, जो अत्याचारी निकला।

धुधकारी के पापों के कारण उसके माता-पिता दुखी हुए। बाद में गौकरण ने श्रीमद्भागवत कथा सुनाकर धुधकारी को प्रेत योनि से मुक्त किया। यह कथा हमें सिखाती है कि माता-पिता का सम्मान करना और सत्कर्मों में लगे रहना चाहिए। भागवत कथा के श्रवण से भक्ति, ज्ञान, और वैराग्य का उदय होता है और जीवन में चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है।
Report By KK Tiwari

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रामायण के भरत और राम के भ्राता प्रेम पर बोलते हुए कथावाचक चिन्मयानन्द ने कहा कि - भरत जैसा प्रेम और भाई मिलना इस धरती पर  अब संभव नहीं लगता है।आज तो समाज में हमें यही देखने को नहीं मिलता  संपत्ति के पीछे भाइयों में हर जगह झगड़ा विवाद देखने को मिलता है  खेल परिसर के बगल वाले मैदान में चल रही श्री राम कथा के सातवें दिन  में भरत चरित्र और  दो भाइयों के बीच के  प्रेम का प्रसंग ही छाया रहा  

इसी सिलसिले में बापू ने सुंदरकांड की कथा का विस्तार करते हुए बताया कि  सुंदरकांड की शुरुआत में जामवंत जैसे वृद्ध की बात हनुमान जी महाराज जैसे नौजवान को पसंद आई इसलिए सुंदरकांड के व्याख्या में तुलसीदास जी ने इसका नाम सुंदरकांड रखा 

बापू ने कहा जिस दिन वृद्ध मां-बाप की बात नौजवान भाई बहनों को अच्छी लगने लगेगी उनके जीवन के प्रत्येक कांड सुंदर ही होने लगेंगे   बापूजी ने कहा कि संसार के सभी दुखों का निवारण श्री हनुमान जी महाराज की उपासना है क्योंकि हनुमान जी महाराज कलयुग के प्रत्यक्ष देव हैं और कण कण में व्याप्त हैं    श्री राम राज्याभिषेक के साथ सप्त  दिवसीय श्री राम कथा को परम पूज्य बापू जी ने विश्राम दिया 

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  कथावाचक चिन्मयानद ने श्री रामकथा के छठवें दिन वरम विवाह के प्रसंग चर्चा के दौरान दहेज़ प्रथा पर अपने अंदाज़ में गहरी चोट करते नजर आये। उन्होंने कहा कि मांगने की प्रथा गलत है जो आजकल विवाह समारोहों  में जोर पकड़ती जा रही है 

उन्होंने लोगों से आव्हान किया कि वो ऐसे लोभियों के यहां कभी अपनी बेटियों का  विवाह न करें,जो लोग विवाह को एक सौदा में परिवर्तित कर रहे हैं खेल परिसर के बगल वाले मैदान में चल रही श्री राम कथा आज छः दिन पूरे हुए 


कथा के प्रारंभ में कथावाचक बापू चिन्मयानन्द ने कहा कि कभी-कभी हमें आशक्ति के कारण भी दुख उठाना पड़ता है । इस धरती पर पूर्ण सुखी कोई नहीं हो सकता जब स्वयं प्रभु राम के पिता को भी रोना पड़ा तो हम सब तो साधारण मनुष्य है। 

बापूजी ने भगवान् राम के जीवन से जुड़े प्रयागराज स्थित वट वृक्ष की चर्चा करते हुए कहा कि जो लोग राम के ऊपर सवाल उठाते हैं राम के अवतार लेने पर सवाल उठाते हैं वह प्रयागराज में जाकर अक्षय वट का दर्शन करें।

जिसको कई बार मुगल शासन में और अंग्रेजों के शासन में जला दिया गया नष्ट कर दिया गया उसकी पश्चात भी अक्षय वट  आज भी प्रयागराज में उपस्थित है और हम उसका दर्शन करते हैं क्योंकि अक्षय वट स्वयं प्रभु राम के जीवन से जुड़ा है जहां वनवास काल के दौरान भगवान राम ने एक रात्रि विश्राम किया था।

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 भगवान् राम के विवाह प्रसंग पर कथावाचक बापू  चिन्मयानन्द ने कहा कि  धनुष अहंकार का प्रतीक है और जब तक मनुष्य के भीतर का अहंकार खत्म नहीं होता तब तक मनुष्य की भक्ति प्रभु को समर्पित नहीं होती। जैसे  भगवान राम द्वारा  धनुष भंग करते ही सीता प्रभु को समर्पित हुईखेल परिसर के बगल वाले मैदान में चल रही श्री राम कथा के आज पांचवे दिन भगवान् का राम का विवाह संपन्न हुआ 

शुरुआत में कथा के दौरान  बापूजी ने कहा कि एक अच्छे और संस्कारी बच्चे का कर्तव्य है की अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद अपने पिता के कार्यों में हाथ बंटाए और उनका सहारा बनेयही सच्चे और एक अच्छे पुत्र का धर्म है

भगवान राम ने जनकपुर की यात्रा के दौरान अहिल्या का उद्धार किया बापूजी ने कहा कि अहिल्या की गलती भी उसके लिए उसका श्राप नहीं आशीर्वाद के रूप में काम आया क्योंकि जिन परमात्मा का दर्शन करने के लिए मनुष्य जन्म जन्मांतर तपस्या करता है, ऐसे परमात्मा की चरण राज उसको एक भूल से ही प्राप्त हो गई उन्होंने अपनी चरण राज से अहिल्या को श्राप से मुक्ति दिलाई  

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  भगवान शिव के विवाह की प्रत्येक शृंगार मनुष्य को कहीं ना कहीं एक संदेश देते हैं। शिव विवाह का वर्णन करते हुए बापूजी ने कहा भगवान शिव अपने शरीर पर चिता की भस्म लगा कर गए उन्होंने समाज को संदेश दिया कि हम जिस शरीर को इतना रंग रोगन कर रहे हैं एक दिन यह शरीर भस्म के रूप में परिवर्तित हो जाएगा यह विचार कथावाचक चिन्मयानन्द ने खेल परिसर के बगल वाले मैदान में चल रही श्री राम कथा के तीसरे दिन की कथा के दौरान व्यक्त किये 

उन्होंने  कहा कि भगवान शिव ने माता सती के झूठ बोलने पर उनका परित्याग किया। पति-पत्नी का रिश्ता दूध और पानी की तरह होता है लेकिन जब उसमें कपट रूपी खटाई पड़ जाती है तो दूध अलग हो जाता है और पानी अलग हो जाता है ऐसे ही पति-पत्नी के रिश्ते में कभी कपट नहीं होना चाहिए बापूजी ने कहा की पति-पत्नी एक दूसरे का सम्मान प्रेम करने के साथ-साथ एक दूसरे से कभी कुछ छुपाये नहीं

कथा के दौरान राम जन्मोत्सव मनाया गया और भगवान की झांकी आने पर पंडाल में खूब नृत्यगान हुआ और उत्सव मनाया गया

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खेल परिसर के बाजू वाले मैदान में चल रही श्री राम कथा के दूसरे दिन में कथा वाचक स्वामी चिन्मयानन्द ने गुरु कि महिमा का बखान किया। उन्होंने कहा कि साधारण मनुष्य कभी गुरु नहीं बन सकता। गुरु को तो मनुष्य के  रूप में देखना ही अपराध है, क्योंकि गुरु साक्षात परमात्मा का स्वरूप होते हैं। 

इसी सिलसिले में साधु समाज की वंदना करते हुए बापूजी ने कहा कि प्रतिकार का पूर्ण सामर्थ्य और सहन करने की पूर्ण शक्ति जिसके अंदर है वही मनुष्य सच्चे रूप में साधु है। वंदना प्रकरण के बाद कथा को शिव चरित्र की ओर मोड़ते हुए कहा कि भगवान शिव अपनी पत्नी के साथ उत्तर से दक्षिण की ओर अगस्त ऋषि के यहाँ  श्री राम कथा सुनने के लिए गए।

बापू जी ने कहा कि यदि दिल में प्यास हो तो पानी कितना भी दूर मिले इंसान पहुंच ही जाता है। यदि हमारे दिल में कथा के लिए प्रेम है तो हमारे शहर में कथा कितनी भी दूर हो सुनने वाला व्यक्ति वहां पहुंच ही जाता है। 

बापूजी ने कहा कि राम कथा हमें सिर्फ सुना ही नहीं है बल्कि राम कथा लहू बनकर हमारे रग रग में दौड़नी चाहिए । भगवान शिव ने राम कथा सुनने के बाद राम दर्शन की मन में लालसा व्यक्त की और उनको भगवान राम का दर्शन भी हुआ।

कथा के माध्यम से बापूजी ने कहा कि हम भी कथा सुनने के बाद भगवान की लीलाओं का चिंतन करें जिससे कि हमारे मन में भी भगवान के दर्शन की लालसा हो और हमें भी भगवत कृपा से भगवान का दर्शन प्राप्त हो

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रामचरितमानस हमें जीवन जीने की कला सिखाती है और भगवान राम के आदर्श से यह सीखना चाहिए कि मनुष्य जीवन कैसे जीना है यह विचार कथावाचक चिन्मयानंद बापू ने खेल परिसर के बगल वाले मैदान में राम कथा का शुभारंभ पर कथा के दौरान कही

उन्होंने कहा कि आज घरों में रामचरितमानस एक कपड़े में बंद हो गई है आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक दिन रामचरितमानस का पाठ करना चाहिए भगवान के चरित्र से यह सीखना चाहिए ककि जीवन के हर रिश्ते कैसे निभाना है

बापू ने कहा कि हम ग्रंथों से दूर हो गए हैं इसलिए आज के समय में हम तनाव में हैं और मानसिक रोगी बनते जा रहे हैं इसलिए जीवन की हर पल पर हमें ग्रंथों से मार्गदर्शन लेना चाहिए

रामकथा-दूसरा दिन 

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 श्री महंत स्वामी किशोर दास देव जू महराज का कहना है कि वर्तमान मे व्यास-पीठ से हंसने हंसाने की कहानियां सुनाई जाती है यह ठीक नहीं है। व्यास पीठ की गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि संत भगवान स्वरूप होते है।


आज पत्रकारों ने औपचारिक चर्चा में उन्होंने बताया कि बुंदेलखंड अंचल संतों और महापुरुषों की भूमि है। ठाकुर जी के भक्त हरिदास जी रसिक देव महाराज की पुण्य जन्मस्थली गढ़ाकोटा में आगामी 6 दिसंबर से पांच दिवसीय संत समागम आयोजित किया जायेगा। 

उन्होंने आज मीडिया से चर्चा में बताया कि पूर्व मंत्री भार्गव जी के सहयोग से यह स्थान धर्मस्थली बन गया गया है। मंदिर निर्माण भी हो चुका है। वृंदावन की रज यहां है। करीब 300 साल पुराना इतिहास जन्मस्थली का है। 

उन्होंने पत्रकारों के सवाल पर कहा कि  धार्मिक स्थानों पर सरकार का सीधा हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। वीआईपी और टिकिट आदि की व्यवस्था में बदलाव हो । उन्होंने कहा कि वर्तमान मे वयास पीठ से हंसने हंसाने की कहानियां सुनाई जाती है यह ठीक नही है। व्यास पीठ की गरिमा और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि संत भगवान स्वरूप होते है। Sagar Watch News

उन्होंने कहा कि संतो की वाणी तो भक्त सुनते है लेकिन उनकी वाणी को अंगीकार नहीं करते । जिसकी वजह से अनैतिकता बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि श्री मद भागवत कथा और भक्तमाल कथा एक ही है। दोनो में चरित्र वर्णन है। मानव कल्याण के लिए यह बने है। 

पंडित अनुराग प्यासी के निवास पर आयोजित चर्चा के दौरान महापौर  संगीता तिवारी, सुशील तिवारी, अनिल तिवारी, प्रभात मिश्रा , प्रमोद उपाध्याय शैलेंद्र ठाकुर अनिल दुबे , पराग शुक्ला ,कपिल उपाध्याय,सहित अनेक भक्तगण मौजूद रहे। महराज जी द्वारा श्री भक्तमाल कथा एवं रास रस चर्चा का श्रवण श्री देव अटल बिहारी जी मंदिर प्रांगण बड़ा बाजार में किया जा रहा है। 

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 किवदंतियों के मुताबिक आज के रानगिर क्षेत्र की पहाड़ी कंदराओं में प्राचीन समय में रावण ने घोर तपस्या की थी इस कारण इसका नाम रावणगिरी हुआ और कालांतर में परिवर्तित होता हुआ सूक्ष्म नाम रानगिर पड़ा। 

ऐसे ही एक अन्य कथानाक के मुताबिक इस स्थान पर भगवान राम के वनवास काल में चरण कमल पड़े थे जिससे इसका नाम रामगिर पड़ा एवं परिवर्तित होते-होते रानगिर हो गया।

एक किवदंती यह भी कहती है कि  देवी भगवती के 52 सिद्ध शक्ति पीठों में से एक शक्तिपीठ है सिद्ध क्षेत्र रानगिर है। पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति के अपमान से दुखित हो सती ने योगबल से अपना शरीर त्याग दिया था भगवान शंकर ने सती के शव को लेकर विकराल तांडव किया तो सारे संसार में हाहाकार मच गया ।

तब विष्णु के सुदर्शन चक्र ने सती के शव को कई अंगों वे बांट दिया। ये अंग जहां जहां भी गिरे वे सिद्ध क्षेत्र के नाम से जाने जाते हैं। कथानुसार सती की रान एवं दांत के अंश जहां  गिरे वह स्थान सिद्ध क्षेत्र रानगिर एवं गौरी दांत नाम से विख्यात हुये। 

सागर से करीब 60 किलोमीटर दूर नरसिंहपुर मार्ग पर रहली स्थित प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र रानगिर अपने आप में एक विशेषता समेटे हुए है। देहार नदी के तट पर स्थित इस प्राचीन मंदिर में विराजी मां हरसिद्धि की ख्याति दूर दूर तक फैली है। 

मां के दर पर आने वाले मे श्रद्धालुं की हर मनोकामना पूरी होती है। यहां पर हर दिन अनेक श्रद्धालुओं का आना होता है लेकिन साल की दोनो नवरात्रि पर हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन कर प्रसाद, भेट चढ़ाते हैं तथा मां के दरबार में अनुष्ठान करते है।

श्रद्धालुओं का जनसैलाब तो नवरात्रि और सभी प्रमुख तीज त्यौहार पर उमड़ता है लकिन चौत्र माह की नवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है जिसमें सागर जिला सहित पूरे मध्यप्रदेश और प्रदेश के बाहर तक के श्रद्धालु रानगिर आते हैं और मां के दरबार में मनौती मांगते है। 

कुछ श्रद्धालु जहां मनौती लेकर आते हैं वही कई श्रद्धालु मनौती पूरी होन पर मां के दरबार मे हाजिरी लगाते है। कहा जाता है कि सच्चे मन से मां हरसिद्धि के सामने जो भी कामना की जाती है वह पूरी हे जाती है और मां के भक्त इसी आशा और विश्वास से मां के दरबार में दौडे चले आते हैं और मां भी अपने भक्तो की मनोकामना पूरी करती हैं।
 
इतिहास की जुबानी रानगिर की कहानी

1732 मे सागर प्रदेश का रानगिर परगना मराठों की राजधानी था। जिसके शासक पंडित गोविंद राव थे। वर्तमान मंदिर पंडित गोविंदराव का निवास परकोटा था। 1760 मे पंडित गोविंद राव की मृत्यु के बाद यह स्थल खण्डहर मे बदल गया। 

इसी खण्डहर के बीच एक चबूतरा था कुछ सालों बाद इसी चबूतरे पर मां हरसिद्धि देवी जी की मूर्ति स्थापित की गई। बाद मे धीरे-धीरे श्रद्धालुओं ने इस खण्डहर को पुनजीर्वित कर विशाल मंदिर का रूप दिया। वर्तमान मंदिर का निर्माण करीब दो सौ साल पहले हुआ था।

तीन रूपों में दर्शन देतीं हैं देवी माता

रहली के रानगिर में विराजी मां हरसिद्धि तीन रूप में दर्शन देती हैं।  प्रातरू काल मे कन्या, दोपहर में युवा और सायंकाल प्रौढ़ रुप में माता के दर्शन होते है। जो सूर्य, चंद्र और अग्नि इन तीन शक्तियों के प्रकाशमय, तेजोमय तथा अमृतमय करने का संकेत है।

रानगिर में विराजित मां की लीला अपरंपार है। दिन मे तीन प्रहरों मे मां तीन रूप में दर्शन देती हैं। सूर्य की प्रथम किरणों के समय मां बाल रूप में दर्शन देती हैं तो  दोपहर बाद  युवा रूप में एवं शाम के  वृद्धा दर्शन देती हैं। 

परिवर्तित हेने वाले मां की छवि में श्रद्धालु अपने आस्था और श्रद्धा मां के चरणो मे समर्पित कर धन्य हो जाते हैं। मां महिमा अपरंपार हैं भक्त जो भी मनोकामना लेकर आते हैं मां उसे अवश्य ही पूर्ण करती हैं।

मां की यह प्रतिमा अति प्राचीन है।  प्रतिमा के साथ छोटी मूर्ति भी बनी हुई है जो किसी सेवक के लिए इंगित करती है। हरसिद्धि का भावार्थ पार्वती देवी ही है। हर का अर्थ महादेव और सिद्धि का अर्थ प्राप्ति है।

आकार ले रहा है आधुनिक झूला पुल 

रानगिर सिद्ध क्षेत्र में पर्यटन एवं श्रृद्धालुओं की सुविधा को देखते हुए आधुनिक झूला पुल का निर्माण कराया जा रहा है। यह पुल रहली और सुरखी को जोड़ेगा जिससे यहाँ अवागमन बढ़ेगा। रानगिर में शासन के द्वारा अनेक विकास कार्य किये जा रहे हैं ।

जिसमें फोरलाईन से पक्की सड़क, मंदिर परिसर, सीसी रोड, देहार नदी पर नवीन पुल आदि प्रमुख निर्माण एवं जीर्णाेद्धार कार्य किये जा रहे हैं अपनी प्रसिद्धि एवं भक्तों के अटूट विश्वास के कारण रानगिर बुंदेलखंड का प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र बन गया है।

माता के दरबार में पहुंचने के लिए देहार नदी के पूर्व तट पर घने जंगलों एवं सुरम्य वादियों के बीच स्थित हरसिद्धि माता के दरबार में पहुंचने के लिए जिला मुख्यालय सागर से दो तरफा मार्ग है। 
सागर, नरसिंहपुर नेशनल हाइवे पर सुरखी के आगे मार्ग से बायीं दिशा में आठ किलोमीटर अंदर तथा दूसरा मार्ग सागर-रहली मार्ग पर पांच मील नामक स्थान से दस किलोमीटर दाहिनी दिशा में रानगिर स्थित है। 

मेले के दिनों में सागर, रहली, गौरझामर, देवरी से कई स्पेशल बस दिन-रात चलती हैं। दोनों ओर से आने-जाने के लिए पक्की सड़कें हैं। निजी वाहनों से भी लोग पहुंचते हैं।

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 बुंदेलखंड का प्रसिद्ध क्षेत्र महावीरों आल्हा -ऊदल के वीरता भरे किस्सों के लिए तो जाना ही जाता है  लेकिन बुंदेलखंड अंचल के लोकप्रिय अबार माता तीर्थक्षेत्र से भी उनका गहरा नाता बताया जाता है  श्रुति के अनुसार बुंदेलखंड  आल्हा ऊदल जैसे वीरों  की मनोकामना अबार माता ने पूर्ण की थी और आल्हा-ऊदल ने है अबार माता का दरबार मंदिर का निर्माण कराया था । कहा तो यह भी जाता जब इस अंचल में डकैतों का बोलबाला था तब वे भी इस मंदिर में पूजा करने आते थे   

12वीं सदी में अस्तित्व में आया ये मंदिर

बुंदेलखंड और वीरों की सदी यानी 12 वीं सदी में पृथ्वीराज चौहान को चौकाने वाले आल्हा ऊदल की कहानी इस मंदिर की स्थापना से जुड़ी हुई है। यहां चैत्र नवरात्र में माता की कृपा पाने लोगों का तांता लगता है। 

बुंदेलखंड के वीर आल्हा-ऊदल ने इस मंदिर को बनवाया था। करीब साढ़े 800 साल पहले वे महोबा से माधौगढ़ जा रहे थे। पहुंचने में देर यानि बुंदेली भाषा में अबेर हो जाने पर उन्होंने यहीं बियाबान जंगल में ही अपना डेरा डाल दिया। 

रात में जब उन्होंने अपनी आराध्य देवी का आह्वान किया तो मां ने उन्हें दर्शन देकर इसी स्थान पर मंदिर बनवाने की प्रेरणा दी। माता की प्रेरणा से उन्होंने यहां चट्टान पर मां की मढ़िया बनावा कर प्रतिमा स्थापित कराई। 

तभी से यहां मां को अबार माता के नाम जाना जाने लगा। चट्टान के पास गर्भगृह में विराजी अबार माता जगत जननी जगदंबा का ही रूप हैें। बाद में जब यहां गांव बसा तो लोगों ने चट्टान के पास मंदिर बनवाकर उसमें सिद्ध प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करा दी। 

किवदंती है कि इस मंदिर में मौजूद एक विशालकाय चट्टान है, जिसका जुड़ाव भगवान शिव से माना जाता है। ऐसी धारणा है यह चट्टान हर महाशिवरात्रि को एक तिल के बराबर विस्तार पाती है, जो वर्तमान में करीब 70 फिट की हो चुकी है। इससे लोगों की आस्था जुड़ी है।

डकैतों की माता का मंदिर के रहस्य

अबार  माता  को डकैतों की माता का मंदिर भी कहा जाता है। बुंदेलखंड के दस्यु युग में दुर्दात और खूंखार डाकू इसी मंदिर में माता के दरबार में हाजिरी लगाते थे। जिनमें पूजा  बब्बा, मूरत सिंह, देवी सिंह जैसे डकैतों से लेकर ग्वालियर-झांसी के डकैत भी यहां आते थे और माता की आराधना कर मनौती का घंटा चढ़ाते थे। 

तीन जिलों की सीमाओं से लगा घने जंगली पहाड़ों में बसा यह मंदिर उनके लिए वाकई एक सुरक्षित स्थान था। एक जिले में डकैती डालकर दूसरे प्रदेश या अन्य जिले में चले जाना यहां से आसान था, क्योंकि उत्तर प्रदेश की सीमा भी यहां से लगी हुई है। वहीं चट्टान से बने इस मंदिर की संरचना भी बहुत रोचक और अनोखी है। यहां कोई छिपा हो तो उसे ढूंढ़ना मुश्किल होगा।

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छोटा-सा पत्थर अपने आप बढ़ते-बढ़ते बनी 70 फीट की चट्टान

पत्थरों और बड़ी-बड़ी भीमकाय चट्टानों से बने इस मंदिर की गहराइयों में कई रहस्य छिपे हैं। ये चट्टानें बड़ी-बड़ी मशीनों से भी हिलाई नहीं जा सकतीं। यहां एक पिलरनुमा चट्टान ऐसी है, जो अपने आप बढ़ती जा रही है। कुछ साल पहले इस चट्टान की चोटी पर माता की छोटी-सी मढ़िया बनाकर मूर्ति स्थापित की गई, जिसके बाद इसका बढ़ना रुक गया। अपितु यह बढ़ते- बढ़ते यह 70 फीट की हो गई है।


नवरात्रि में हर दिन आते है 50 हजार से 1 लाख लोग

अबार माता मंदिर में आम दिनों में रोजाना 2 हजार लोग माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर पहुंचने वालो में छतरपुर जिले के अलावा टीकमगढ़, सागर, दमोह के श्रद्धालु भी आते हैं। छतरपुर जिला मुख्यालय से 105 और बड़ामलहरा विकासखंड मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर रामटौरिया के पास अबार माता का मंदिर स्थिति है, जहां जाने के लिए बस,टैक्सी सुविधा उपलब्ध हैं।

पंचमी व अष्टमी को होता है विशेष श्रंगार

नवरात्रि में अबार माता का हर दिन श्रंगार होता है। पंचमी और अष्टमी को विशेष श्रंगार किया जाता है। वहीं वैसाख माह की नवरात्रि में दस दिन तक विशेष मेला लगता है। हालांकि शारदीय नवरात्रि पर भी मेले जैसा माहौल रहता है, लेकिन वैसाख माह का मेला प्रसिद्ध है।

सागर से कैसे पहुंचे अबार माता धाम तक

छतरपुर जिले के बड़ामलहरा अनुभाग से महज 40 किमी दूरी पर स्थित अबार माता मेला में बहुत भीड़ देखने को मिलती है। धाम तक पहुंचने के लिए  सागर छतरपुर रोड से शाहगढ़ विकासखंड के रामटोरिया गांव मे बस एवं निजी वाहन से आसानी से पहुंच सकते हैं।

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